मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

आप हैरान हो जायेंगे अपने देश के बारें में यह जानकर

भारत के बारे में ऐसे कई अज्ञात तथ्य हैं जिसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। इस देश ने महान व्‍यक्ति जैसे आर्यभट्ट ने शून्य के आविष्कारक को जन्‍म दिया है। अगर आप भारत के इतिहास में जाएं तो आपको होश उड़ा देने वाले तथ्‍य मिलेंगे जिस पर आप गर्व से कह सकते हैं कि आप भारतीय हैं।

1. तैरने वाला पोस्ट ऑफिस


विश्व की सबसे बड़ी डाक व्यवस्था केवल भारत में ही है जो अपनी सेवन गांव, शहद और कसबों तक पहुंचाती है। कशमीर के डल लेक में हाल ही में एक तैरने वाला पोस्‍ट ऑफिस शुरु किया गया है।

2. कुम्भ मेला


2011 के कुंभ मेले में 75,000,000 से अधिक तीर्थयात्री एकसाथ इकट्ठे हुए थे जो की दुनिया में एक ही सभा में इकट्ठे होने वाले सबसे ज्यादा लोग थे मेला इतना बड़ा था की इसकी भीड़ को अन्तरिक्ष से भी देखा जा सकता था।

3. शकुन्तला देवी (मानव कैलकुलेटर)


आप इस गणना को बिना कैलकुलेटर के कितनी देर में हल कर सकते है (7,686,369,774,870 म 2,465,099,745,779) कम से कम 5-10 मिनट लग जाएंगे। लेकिन इस सवाल को बिना किसी कैलकुलेटर के शकुन्तला देवी ने सिर्फ 28 सेकंड में हल कर दिया। यही कारण था उनको मानव कैलकुलेटर की उपाधि मिली। 

4. भारतीय नेशनल कबड्डी टीम


अभी तक 5 बार पुरुष कब्बडी वर्ल्ड कप आयोजित किया गया है जिसमे पांचो बार भारतीय टीम ने बाजी मारी है भारतीय महिला कब्बडी टीम ने भी आज तक आयोजित हुए सभी वर्ल्ड कप जीते है।
5. भारत का पहला रोकेट
आज भले ही भारत प्रगतिशील देशो की सूची में शामिल किया जाता हो, लेकिन क्या आप जानते है भारत का पहला रॉकेट साइकिल पर लाया गया था। जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ईसरो) ने किसी अन्य अनुसंधान संगठन के साथ पहला रोकेट विकसित किया तब भारत का पहला रोकेट साइकिल पर लाया गया गया था।
6. स्विट्जरलैंड का विज्ञानं दिवस
भारत के पूर्व राष्ट्रपति सर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को सम्मानित करने के लिए स्विट्जरलैंड सरकार ने 26 मई 2005 को विज्ञान दिवस (साईंस डे) के रूप में मनाने की घोषणा की। क्यूंकि इसी दिन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने स्विट्जरलैंड का दौरा किया था इससे उनकी लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
7. सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश
सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश भारत में जितने ज्‍यादा किसान हैं उतना ही ज्‍यादा यहां दूध का भी उत्‍पादन होता है।
8. सबसे बड़ा क्रिकेट ग्राउंड
देव भूमि कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश के चैल में दुनिया का सबसे ऊंचा क्रिकेट ग्राऊंड है। चैल क्रिकेट ग्राऊंड समुद्री सतरह से 2,444 मीटर की ऊंचाई पर बना है। इसे 1893 में बनाया गया था और ये चैल आर्मी स्कूल का हिस्सा है।
9. शतरंज और सांप सीढी
शतरंज का अविष्कार भारत में ही हुआ था। इसे ‘चतुरंग संस्कृत’ के नाम से जाना जाता था जिसका अर्थ होता है ‘एक सेना के चार सदस्य’। जबकि सांप सीढी का खेल 13वीं शताब्दी में कवि संत ज्ञान देव द्धारा तैयार किया गया था। इस खेल के पीछे भलाई और दुराचार की शिक्षा छुपी हुई है।
10. सबसे ज्‍यादा अंग्रेजी बोला जाने वाला 
देश भारत अमरीकैा के बाद विश्व का दूसरा देश हैं जहां सबसे ज्यादा अंग्रेजी बोली जाती है। भारत में 29 राज्य हैं जहां हिंदी और अंग्रेजी मानक भाषा के रूप में प्रयोग किया जाता है।

रविवार, 6 सितंबर 2015

-अमेरिका में शिक्षक को वी.आई.पी. की श्रेणी में रखा जाता है।
-फ्रांस की न्यायालयों में सिर्फ शिक्षक को ही कुर्सी पर बैठने की अनुमति होती है, शेष लोगों को खड़े रहना पड़ता है।
-जापान में यदि पुलिस को, किसी शिक्षक को, गिरफ्तार करना हो तो उसे पहले जापान की सरकार से विशेष आज्ञा लेनी पड़ती है।
-कोरिया में प्रत्येक शिक्षक अपना पहचान पत्र दिखाकर किसी भी प्रकार की विशेष वी.आई.पी. सुविधा प्राप्त कर सकता है।
लेकिन हमारे भारत में..?? हमारे भारत में, एक शिक्षक को अपने मासिक वेतन के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। अपने मौलिक अधिकारों के लिए लडना पड़ता है। यहां तक की उसे समाज में भी उलाहनाऐं सुननी पड़ती है। हां... वर्ष में एक दिन लोग उन्हे उनके शिक्षक होने की बधाई अवश्य देते है... जैसे मानो उन्हे उनके शिक्षक होने का आभाष कराते हैं।
जरा ध्यान दीजिए की अमेरिका, फ्रांस, जापान और कोरिया वर्तमान में तकनीक, शिक्षा, चिकित्सा, विकास हर क्षेत्र में आगे है। इन देशों के लोग हमसे सौ वर्ष आगे है। पूरे विश्व में एक सुई से लेकर प्रत्येक घरेलू सामानों, तकनीकी संसाधनों, युद्धक हथियारों तक के बाजार हिस्सेदारी में इन चारों देशों के ही 80 प्रतिशत से अधिक सामान बिकते है...
जबकि गुरू शिष्य परम्परा का जन्मदाता हमारा भारत कहां है??
सबको पता है...
गर्त में...

रविवार, 30 अगस्त 2015

जलता गुजरात और आरक्षण की राजनीति

पिछले एक सप्ताह से गुजरात जल रहा है। हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि सरकार को सेना लगानी पड़ रही है। आगजनी और उपद्रव में अब तक 10 से अधिक लोग मारे जा चुके है। गुजरात में दबंग माने जाने वाले पटिदारों (पटेलों) की अपने लिए आरक्षण की मांग के लिए चलाए जा रहे आंदोलन के चलते ये परिस्थितियां पैदा हुयी है।
        जहां एक तरफ ये आंदोलन मोदी के ‘गुजरात माडल’ की हकीकत बयां करता है वहीं दूसरी तरफ इसके नेता द्वारा दिए जा रहे तर्क वही हैं जो सालों से आरक्षण विरोधियों द्वारा दिए जाते रहे हैं        आजादी के बाद से ही देश के पूंजीवादी विकास ने एक तरफ अरबपतियों की संख्या को बढ़ाया है तो वहीं दूसरी तरफ करोड़ो की संख्या में तबाह-बर्बाद लोगों की फौज खड़ी की है। निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण के तहत पिछले दो दशकों का विकास भी रोजगार विहीन रहा है। रोजगार का आलम यह है कि हर पढ़ा-लिखा तीसरा नौजवान बेरोजगार है। नए पैदा हो रहे रोजगारों में अधिकांशतः ही ऐसे है जिनमें भविष्य की कोई गारण्टी नही। ऐसे में अधिकांश नौजवानों को अपना बेहतर भविष्य सरकारी नौकरियों में दिखायी देता है। लम्बी होती बेरोजगारों की भीड़ और उसके मुकाबले सरकारी नौकरियों के चुनिन्दा अवसरों ने युवाओं में जबरदस्त मार-काट (प्रतियोगिता) को जन्म दिया है। इसी गलाकाटू प्रतियोगिता ने  उस सोच को पैदा किया है जहां इन अवसरों के सामने खड़ी हर चीज सबसे बड़ी दुश्मन दिखायी देती है।         यही वो कारण है जिसने गुजरात में समृद्ध माने जाने वाले पटिदारों को भी आरक्षण के लिए आंदोलन करने को मजबूर किया है। 7 मंत्री, लगभग 40 विधायक, डायमण्ड उद्योग में अच्छी खासी हिस्सेदारी के बावजूद पटेलों का भी एक हिस्सा इन्हीं नीतियों के चलते मालदार बना है तो बाकि का हिस्सा कंगाल। और ये पूरे देश के साथ-साथ गुजरात की भी हकीकत है। पूरे देश की ही तरह इस बर्बाद आबादी से आने वाले युवाओं को भी अपनी तरक्की की राह में सिर्फ एक ही रोड़ा दिखायी देता है और वो है- आरक्षण।        युवाओं की आखों पर पड़ा यह पर्दा देश के शासक वर्ग और खुद पटेलों के समृद्ध हिस्से, जिन्होने इन्हीं नीतियों के कारण अरबों कमाए की लूट को छुपा लेता है। यह पर्दा सबको रोजगार ना दे पाने की पूंजीवादी व्यवस्था की हकीकत को छुपा लेता है। यह पर्दा बेरोजगारों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर उन्हें संगठित न होने देने की चाल को छुपा लेता है। और यही सब देश का शासक वर्ग चाहता है।         आरक्षण, सदियों के जुल्मों-उत्पीड़न के चलते सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक रूप से पीछे रह गयी आबादी में से एक हिस्से को आगे बढ़ने का मौका देता है। इसी की वजह से निम्न जातियों में से भी कुछ लोग आगे बड़ पाए है। इसके बावजूद भी अगर देश में करोड़ो-करोड़ बेरोजगार हैं तो इसका कारण आरक्षण नही बल्कि नौकरियों का कम होना है। इसका कारण पूंजीवादी व्यवस्था की मुनाफे की हवस में है, जिसे पूरा करने के लिए बेरोजगारों की एक रिजर्व फौज बनाकर रखी जाती है। इसलिए इसका समाधान भी आरक्षण विरोध में नही बल्कि सबके जिए सम्मानजनक रोजगार का नारा बुलंद करने में है।

बुधवार, 26 अगस्त 2015

छात्र नेता से राजनेता

सफेद कुर्ता पजामा और चमड़े की चप्पल पहनना बाहर से जितना आसान दिखाई देता है उतना ही अंदर से यह कठिन है। लेकिन युवा वर्ग का राजनीति में बढ़ता रुझान इस बात का संकेत है कि वह देश की बागड़ोर अपने हाथ में लेने के लिए कितना उत्सुक है। 

आज अनेक युवा नेता राज‍नीतिक घरानों से आ रहे हैं लेकिन आम युवा छात्र राजनीति से अपनेकी शुरुआत कर रहे हैं। में राजनीति विद्यालय, विश्वविद्यालय, युवा छात्र संगठन, युवा संगठन तक बढ़कर राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचती है।

आज अनेक ऐसे दिग्गज नेता हैं जिन्होंने यह सफर तय करके राजनीति में अपना मजबूत आधार स्थापित किया। आइए हम जानते हैं कुछ ऐसे ही दिग्गज नेताओं के बारे में, जिन्होंने अपना राज‍नीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरु किया है।

एक गरीब परिवार में जन्मे राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद यादव ने अपनी राज‍नीति की शुरुआत एक छात्र नेता के रुप में जयप्रकाश आन्दोलन से की थी। 

भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपने विद्यार्थी जीवन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता रहे। वे 1972 में मिर्जापुर शहर के संघकार्यवाहक बने। वर्ष 1967 से 1971 तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् गोरखपुर संभाग के संगठन सचिव भी रहे।

राजीव प्रताप रुड़ी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र संघ के एक नेता के रुप में ‍की थी सबसे पहले गवर्नमेंट कॉलेज चंड़ीगढ़ के अध्यक्ष चुने गए और बाद में विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए आज वह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और बिहार से राज्य सभा के सांसद हैं। 

नितिन गड़करी ने भी अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1976 में नागपुर विश्वविद्यालय में भाजपा की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से की थी। बाद में वह 23 साल की उम्र में भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने और आज वे भाजपा के अब तक के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने बीएमसीसी कॉलेज से बीकॉम किया। वह कक्षा में एक औसत छात्र थे लेकिन कक्षा के बाहर छात्र राज‍नीति में बहु‍त ही सक्रिय थे। और वह शुरू से ही राजनीति के प्रति समर्पण की भावना का परिचय देते रहे हैं।

मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1975 में भोपाल के मॉडल हायर सेकेंड़री स्कूल के छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में की और 1977-78 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री बने।

कई ऐसे नेता है जो छात्र नेता से ही राजनेता बने हैं और अपनी राजनीतिक दूरदृष्टि से देश को बहुत कुछ दिया है। एक आम युवा जिसकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमी नही है, उसके लिए छात्र राजनीति ही मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश का जरिया मानी जाती है। छात्र राजनीति से ही वह अपने अन्दर छिपी संगठन को मजबूत बनाने की भावना, लोगों को अपने से जोड़ने की क्षमता का परिचय दे सकता है और देश को भविष्य में एक मजबूत और सफल राज‍नीतिज्ञ बनने का अहसास करा सकता है।

जब से राहुल गांधी सक्रिय राजनीति में आए है तब से अनेक युवाओं का रुझान राजनीति की तरफ हुआ है। वह किसी ना किसी राज‍नीतिज्ञ को अपना प्रेरणा स्त्रोत मानते हुए खुद एक सफल नेता बनने के लिए विद्यालय, महाविद्यालय से ही छात्र नेता बनकर अपने कॉलेज का प्रतिन‍िधित्व करने और दूसरो की समस्या को जिम्मेदार तक पहुचाने की लालियत उन्हें उनके मुकाम तक पहुंचाने के लिए सहायता करती है। छात्र नेता से ही एक सफल राजनेता का जन्म होता है।

क्रांतिकारी छात्र संघों के लिए संघर्ष करो! छात्र राजनीति में पसरी गुण्डागर्दी के विरुद्ध एकजुट हो!!

साथियो, 
    छात्र संघ चुनाव का माहौल अपने पूरे चरम पर है। परिसर होर्डिंग, बैनरों, पोस्टरों, चेस्ट कार्ड, आदि से पटे हुए हैं। परिसर में प्रत्याशी अपने समर्थकों के झुण्डों के साथ घूम-घूमकर वोट की अपील कर रहे हैं। शहर में यही समर्थक मोटरसाइकिलों पर बैठ उन्मादी शोर मचाते हुए गुजरते देखे जा सकते हैं। यह माहौल भले ही हममें से अधिकांश को पसंद न हो, लेकिन आज यही छात्र संघ चुनावों का प्रतीक बन चुका है। साल दर साल यही कहानी दोहरायी जा रही  है। साथ ही दोहरायी जा रही है, इस दौरान होने वाली गुण्डागर्दी। राजधानी देहरादून से लेकर कोटद्वार, ऋषिकेश, रामनगर व अन्य परिसरों में भी एक के बाद एक झगड़े हुए।

    इन सारे झगड़े-फसादों के दौरान प्रशासन को हमारे परिसरों को पुलिस छावनियां बनाने का पूरा मौका मिल गया है। आम छात्र एक तरफ छात्र राजनीति के नाम पर गुण्डागर्दी करने वाले इन तत्वों और दूसरी तरफ भारी पुलिस बल की मौजूदगी से किसी हद तक भयग्रस्त हंै। इस मुद्दाविहीन छात्र संघ चुनाव के शोर-शराबे, हंगामे, लड़ाई-झगड़ों व पुलिसिया खौफ के बीच हम आपसे छात्र राजनीति मंे पसरी इस गुण्डागर्दी से जुड़े कुछ प्रश्नों पर चर्चा करना चाहते हैं।
छात्र हितों के लिए लड़ना और गुण्डागर्दी क्या एक चीज है?
अक्सर ही गुण्डागर्दी करने वाले यह छात्र नेता जताते हैं कि वे छात्र हितों के लिए लड़ रहे हैं। अपनी गुण्डागर्दी को वे इसी रूप में जायज ठहराने की कोशिश करते हैं। लेकिन यह ऐसा कैसा छात्र संघर्ष है, जिसमें आम छात्र मौजूद ही नहीं हैं। न ही आम छात्रों का संघर्ष के लिए कोई आह्वान ही किया जाता है। फिर महाविद्यालय के आम कर्मचारियों से मारपीट करना, इस गुण्डागर्दी का विरोध करने वालों के साथ भी मारपीट करना और चुनावबाज छात्र गुटों का आपस में झगड़ना छात्र हितों से कैसे जुड़ा हुआ है। दूसरा, यह सारे झगड़े-फसाद अक्सर चुनाव के दौरान ही क्यों होते हैं? छात्र हितों के लिए संघर्ष करने का दावा करने वाले ये लोग बाकी साल भर कहां रहते हैं?
    दरअसल यह कोई छात्र हितों के लिए संघर्ष नहीं है, बल्कि गुण्डागर्दी है। इन गुण्डागर्दों के पास वास्तव में छात्र संघर्षों का कोई एजेण्डा ही नहीं है। इसलिए इन्हें संघर्ष हेतु छात्रों को आह्वान करने की भी जरूरत नहीं है। आम छात्र इनके लिए महज वोट हैं।
यह गुण्डागर्द कौन हैं और वे क्या चाहते हैं?
    छात्र राजनीति के नाम पर गुण्डागर्दी करने वाले यह लोग महज चुनावबाज हैं। चुनाव में येन-केन प्रकारेण जीतना इनका एकमात्र उद्देश्य है। चुनाव से पहले छात्रों के बीच इनकी कोई पहचान नहीं होती है। कम से कम छात्र हितों के लिए संघर्ष करने वालों के रूप में तो नहीं होती है। ऐसे में सस्ती पहचान बनाने के लिए यह लोग गुण्डागर्दी व तोड़-फोड़ का सहारा लेते हैं। खुद को संघर्षशील की बजाय ‘दबंग’ नेता के रूप में प्रस्तुत करना ही इनके लिए पर्याप्त है। इन छात्र नेताओं व संगठनों के पीछे चुनावबाज राजनीतिक पार्टियां व नेता होते हैं। राजनीतिक पार्टियां ऐसे छात्र नेताओं के जरिये छात्रों के बीच अपना वोट बैंक बनाने की कोशिश करते हैं। अपनी बारी में ऐसे छात्र नेता अपने सरपरस्त नेताओं की चमचागिरी कर चुनावबाज राजनीति की ऊंची सीढ़ियां चढ़ने की फिराक में रहते हैं। यही वजह है कि कैरियर लोलुप ऐसे छात्र नेता साल भर छात्रों के बीच से गायब रहते हैं और छात्र हितों से उनका कोई सरोकार नहीं होता।
यह गुण्डागर्दी क्या साबित करती है?
    सर्वप्रथम यह गुण्डागर्दी साबित करती है कि आज हमारे इर्द-गिर्द की छात्र राजनीति कितनी ज्यादा मुद्दाविहीन हो चुकी है। यह चुनावबाज छात्र संगठन व गुट छात्र हितों से बहुत दूर जा चुके हैं। छात्र हितों से दूर यह एक-दूसरे के साथ चुनावी वर्चस्व की लड़ाई में ही मशगूल हैं। गुण्डागर्दी इसका स्वाभाविक परिणाम है। दूसरा, गुण्डागर्दी करने वाले इन लोगों में सत्य व तर्क की ताकत समाप्त हो चुकी है। यह लोग मानसिक नपुंसकता से ग्रस्त हैं। इसलिए जब भी कोई सही तर्क करता है अथवा छात्रों से जुड़ा सही मुद्दा उठाता है तो यह लोग भयग्रस्त व कुंठित हो जाते हैं। अपने इस भय व कुंठा में वे गुण्डागर्दी पर उतर जाते हैं। तीसरा, इस प्रकार की छात्र राजनीति भगतसिंह की क्रांतिकारी विरासत से कितनी दूर खड़ी है, यह भी हम समझते हैं। जहां भगतसिंह छात्र आंदोलन में वैचारिक शक्ति की आवश्यकता पर बल देते हैं, वहां ये छात्र नेता अक्ल के अंधे बनकर घूम रहे हैं। हमारे क्रांतिकारियों के त्याग-समर्पण के आदर्शों के विपरीत खुदगर्जी और मौज-मस्ती ही इनका आदर्श है। कुल मिलाकर ऐसे तत्व क्रांतिकारी छात्र आंदोलन के विकास में गंभीर समस्या बन चुके हैं।
इस गुण्डागर्दी से छात्र हितों का क्या नुकसान है?
    आज छात्र समुदाय के सामने शिक्षा और रोजगार से जुड़ी गंभीर समस्याएं खड़ी हैं। इन समस्याओं के समाधान और बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए छात्रों को व्यापक आंदोलन छेड़ना होगा। लेकिन हमारी पूंजीवादी सरकारें व उनके पिट्ठू संस्थाध्यक्ष परिसरों में ऐेसे किसी आंदोलन को खड़ा नहीं होने देना चाहते हैं। लिंगदोह समिति की सिफारिशें व सर्वोच्च न्यायालय के आदेश इसी का प्रयास हैं।
    लम्पट छात्र नेताओं द्वारा की जाने वाली यह गुण्डागर्दी शासन-प्रशासन की योजना में मददगार है। इस गुण्डागर्दी का बहाना बनाकर परिसरों को पुलिस छावनियों में तब्दील कर दिया गया है। लिंगदोह समिति की सिफारिशों को लागू कर छात्र संघों को पंगु बनाया जा रहा है। परिसरों के अंदर व्यापक छात्र आंदोलन के निर्माण की संभावना को कुचला जा रहा है।
    ऐसे में गुण्डागर्दी फैलाने वाले इन छात्र नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि वे किसके पक्ष में खड़े हैं। शासन-प्रशासन व पुलिस के अथवा आम छात्रों के।
छात्र राजनीति में पसरी इस गुण्डागर्दी का जवाब कैसे दिया जाए?
    लिंगदोह समिति की सिफारिशें लागू करते समय यह दावा किया गया कि यह छात्र राजनीति के अपराधीकरण पर रोक लगायेगी। इन सिफारिशों से गुण्डागर्दी पर कितनी रोक लगी है, यह जगजाहिर है। लिंगदोह साहब ने तो अपनी रिपोर्ट दे देने के बाद शायद ही पलटकर परिसर की तरफ देखा हो। इस मामले में वह शायद मुंह चुराना ही बेहतर समझ रहे होंगे। असल में गुण्डागर्दी खत्म करना इन सिफारिशों का मुख्य उद्देश्य था भी नहीं। इनका उद्देश्य छात्रों की संस्था छात्र संघों को कमजोर करना था और इसमें एक हद तक वे कामयाब हुए हैं।
    वास्तव में किसी प्रकार के प्रशासनिक या कानूनी सुधारों से इस गुण्डागर्दी को समाप्त किया ही नहीं जा सकता। तब तो और भी नहीं, जब राजनेताओं, अधिकारियों, पुलिस, पूंजीपतियों और अपराधियों का पूरा एक गठजोड़ पहले से कायम हो। परिसरों में गुण्डागर्दी करने वाले यह तथाकथित छात्र नेता इस गठजोड़ का ही हिस्सा हंै।
    परिसर में व्याप्त गुण्डागर्दी को व्यापक छात्र समुदाय ही अपने एकजुट हस्तक्षेप से रोक सकता है। जब वास्तविक छात्र हितों के गिर्द व्यापक छात्र आंदोलन खड़ा होगा, तभी ऐेसे गुण्डागर्दों को हाशिए पर डाला जा सकेगा। दरअसल हमारी कमजोरी ही उनकी मजबूती है। अपने आप में ऐसे गुण्डा तत्व बहुत कमजोर होते हैं।
    परिवर्तनकामी छात्र संगठन छात्र हितों के लिए समर्पित है। हम मानते हैं कि मौजूदा समय में छात्रों को व्यापक आंदोलन खड़ा करना होगा। जिससे पूंजीवादी व्यवस्था की नींव तक ढह जाए। ऐसे संघर्ष के लिए हम आप सभी छात्रों का आह्वान करते हैं। 

पुणे, के 5 छात्रों को 18 अगस्त को आधी रात में पुलिस ने गैर जमानती धाराओं में गिरफ्तार कर लिया।

अभी कुछ ही दिन बीते हैं जब लाल किले के प्राचीर से हमें आजादी के हसीन ख्वाब दिखाए जा रहे थे। ये आजादी कितनी अधूरी है, इसे 1947 के बाद से ही आम मेहनतकश जनता रोज-बा-रोज के अपनी जिंदगी के कटु अनुभवों से देखती आ रही है। इन्हीं उदाहरणों में एक और इजाफा हुआ है। भारतीय फिल्म एण्ड टेलीविजन संस्थान (FTII) पुणे, के 5 छात्रों को 18 अगस्त को आधी रात में पुलिस ने गैर जमानती धाराओं में गिरफ्तार कर लिया। ये छात्र पिछले 68 दिनों से संस्थान में गजेन्द्र चैहान समेत 5 अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्ति का विरोध कर रहे थे। ऐसा नहीं है कि ये गिरफ्तारी अचानक हुयी है। हड़ताल के पहले दिन से ही छात्रों को निरंतर डराया-धमकाया जा रहा था। हड़ताल को तुड़वाने के लिए सरकार द्वारा संस्थान का निजीकरण करने की धमकी भी दी गयी। संघी मण्डली द्वारा छात्रों को देशद्रोही-हिन्दू विरोधी आदि तमगों से नवाजकर आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश भी की गयी । इन सबके बाद भी जब सरकार के प्रपंच छात्रों को डिगा नही सके तो उसने खुद अपने कुरूप चेहरे से नकाब उतारते हुए, छात्रों पर फर्जी मुकदमें लादकर जेलों में पहुंचा दिया।
सरकार की नजर में ये छात्र अपराधी हैं। पर आम छात्रों और देश की करोड़ों-करोड़ मेहनतकश जनता की नजरों में वे हमारे साथी हैं। क्योंकि वो ऐसी सरकार से संघर्ष कर रहे हैं,

बिहार में 29 साल के बाद छात्र संघ चुनाव की उम्मीद!

 बिहार में 29 साल के बाद छात्र संघ चुनाव की उम्मीद!
बिहार सरकार के चुनाव कराने का निर्देश देने के बाद राज्य के विश्वविद्यालयों में एक बार फिर छात्र संघ चुनाव होने की उम्मीद जगी है। राज्य के विश्वविद्यालयों में 1984 के बाद से छात्र संघ का चुनाव नहीं हुआ है। जबकि छात्र संघ चुनाव कराने के लिए छात्र संगठन बराबर आंदोलन करते हैं। वैसे छात्र संगठनों को अब भी भरोसा नहीं है कि ये चुनाव जल्द होंगे। बिहार के शिक्षा मंत्री पी.के. शाही ने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलसचिवों को पत्र भेजकर चुनाव कराने का निर्देश दिया है।
बिहार में अंतिम छात्र संघ चुनाव 1984 में पटना विश्वविद्यालय में हुआ था। इससे पूर्व 1980 में मगध विश्वविद्यालय के छात्र संघ का चुनाव हुआ था। राज्य के विश्वविद्यालयों के छात्र संघों के चुनाव 1984 के बाद से विभिन्न कारणों के चलते अब तक बंद हैं। बिहार के प्रसिद्घ पटना विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं ने देश एवं प्रदेश की राजनीति में अपनी छाप छो़डी है।

" हमेशा हँसते रहिये, एक दिन ज़िंदगी भी आपको परेशान करते करते थक जाएगी ।


जाहिर हैं वह बहुत हताश था. कही से कोई राह
नहीं सूझ रही थी.
आशा की कोई किरण दिखाई न देती
थी.
एक दिन वह एक park में बैठा अपनी परिस्थितियो पर
चिंता कर रहा था.
तभी एक बुजुर्ग वहां पहुंचे. कपड़ो से और चेहरे से
वे काफी अमीर लग रहे थे.
बुजुर्ग ने चिंता का कारण पूछा तो उसने अपनी
सारी कहानी बता दी.
बुजुर्ग बोले -” चिंता मत करो. मेरा नाम John D. Rockefeller
है.
मैं तुम्हे नहीं जानता,पर तुम मुझे सच्चे और ईमानदार
लग रहे हो. इसलिए मैं तुम्हे दस लाख डॉलर का कर्ज देने को
तैयार हूँ.”
फिर जेब से checkbook निकाल कर उन्होंने रकम दर्ज
की और उस व्यक्ति को देते हुए बोले, “नौजवान, आज
से ठीक एक साल बाद हम ठीक
इसी जगह मिलेंगे. तब तुम मेरा कर्ज चुका देना.”
इतना कहकर वो चले गए.
युवक shocked था. Rockefeller
तब america के सबसे अमीर व्यक्तियों में से एक
थे.
युवक को तो भरोसा ही नहीं हो रहा था
की उसकी लगभग सारी
मुश्किल हल हो गयी.
उसके पैरो को पंख लग गये.
घर पहुंचकर वह अपने कर्जो का हिसाब लगाने लगा.
बीसवी सदी की
शुरुआत में 10 लाख डॉलर बहुत बड़ी धनराशि
होती थी और आज भी है.
अचानक उसके मन में ख्याल आया. उसने सोचा एक अपरिचित
व्यक्ति ने मुझपे भरोसा किया,
पर मैं खुद पर भरोसा नहीं कर रहा हूँ.
यह ख्याल आते ही उसने चेक को संभाल कर रख
लिया.
उसने निश्चय कर लिया की पहले वह
अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेगा,
पूरी मेहनत करेगा की इस मुश्किल से
निकल जाए. उसके बाद भी अगर कोई चारा न बचे तो वो
check use करेगा.
उस दिन के बाद युवक ने खुद को झोंक दिया.
बस एक ही धुन थी,
किसी तरह सारे कर्ज चुकाकर अपनी
प्रतिष्ठा को फिर से पाना हैं.
उसकी कोशिशे रंग लाने लगी. कारोबार उबरने
लगा, कर्ज चुकने लगा. साल भर बाद तो वो पहले से
भी अच्छी स्तिथि में था.
निर्धारित दिन ठीक समय वह बगीचे में
पहुँच गया.
वह चेक लेकर Rockefeller की राह देख रहा था
की वे दूर से आते दिखे.
जब वे पास पहुंचे तो युवक ने बड़ी श्रद्धा से उनका
अभिवादन किया.
उनकी ओर चेक बढाकर उसने कुछ कहने के लिए
मुंह खोल ही था की एक नर्स भागते हुए
आई
और
झपट्टा मरकर वृद्ध को पकड़ लिया.
युवक हैरान रह गया.
नर्स बोली, “यह पागल बार बार पागलखाने से भाग जाता
हैं
और
लोगो को जॉन डी . Rockefeller के रूप में check
बाँटता फिरता हैं. ”
अब वह युवक पहले से भी ज्यादा हैरान रह गया.
जिस check के बल पर उसने अपना पूरा डूबता कारोबार फिर से
खड़ा किया,वह
फर्जी था.
पर यह बात जरुर साबित हुई की वास्तविक
जीत हमारे इरादे , हौंसले और प्रयास में
ही होती हैं.
हम सभी यदि खुद पर विश्वास रखे तो
यक़ीनन
किसी भी असुविधा से, situation से निपट
सकते है.
" हमेशा हँसते रहिये,
एक दिन ज़िंदगी भी
आपको परेशान
करते करते थक जाएगी ।

बिहार में छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार छात्र-संघ चुनाव क्यों नहीं ?

बिहार में छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार छात्र-संघ चुनाव क्यों नहीं ?
आज बिहार की स्तिथी किसी से छुपी नहीं है.बिहार की शिक्षा वयस्था आज बिहार के लिया कलंक बन चुकी है.चारो तरफ शिक्षा में लुट मची है.बिहार के कुछ को छोर दे तो आज किसी भी स्कूल,कोलेज में पढाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हो रही है.और बिहार सरकार अपनी कुर्सी बचाने के चक्कर में बिहार के शिक्षा वयस्था को आई सी यू में डालने का कम कर दिया .मित्रो आज फिर से बिहार जे पी जैसे महान हस्तियों को जन्म लेना परेगा.क्या बिहार में जी पी पैदा नहीं हो सकता क्या ? मित्रो हम,आप बन सकते हैं.और बिहार को फिर से दुनिया के नजरों में सबसे आगे ला सकते हैं.मित्रो इसका सबसे बड़ा करना जो है बिहार में २९ साल से छात्र संघ का चुनाव नहीं हुआ.कुछ साल बिहार के दो विश्वविद्यालय में हुई भी लेकिन फिर बंद कर दिया.इन वन्शवादों के नेता को लगता है यदि बिहार में छात्र संघ चुनाव हो गया तो मेरा ये दलाली,टिकट बेचने का धंधा बंद हो जायेगा जब नया नेत्रित्व चुन कर आयेगा.आपको जानकर आश्चर्य होगा की आज बिहार में जितना भी सत्ता से लेकर विपक्ष तक जितने भी नेता हैं.लगभग सभी छात्र संघ चुनाव से चुनकर नेता बने और छात्रो के अधिकार को दबाने का कम किया.आज फिर से बिहार के छात्रों के लिए एक चुनोती की घड़ी आ गयी है. बिहार के इस निक्कमी सरकर को जगाने का कम कर बिहार में फिर से छात्र संघ चुनाव बहाल करवाकर सभी गरीब छात्रों,टेलेंटेड छात्रों को भी राजनीती में आने का मौका मिले.

सोमवार, 24 अगस्त 2015

5000 स्कूलों में रसोई गैस से बनेगा मिड-दे मील

पटना| राज्य के पाँच हजार प्रारंभिक स्कूलों में रसोई गैस से मिड दे मील बनेगा। इस योजना में राज्य के सभी जिले शामिल है
इसके लिए जल्द ही गैस का कॉमर्शियल कनेक्शन लिया जाएगा। जिलो को निर्देश दिया गया है की स्कुल से बात कर के उन्हें कनेक्शन दिलवाएं ताकि जल्द यह योजना शुरू हो सके।
मिड - डे मिल के निदेशक संजीवन सिन्हा ने कहा की शुरू में पाँच हजार स्कुलो में यह सुविधा मिलेगी।
बाद में अन्य स्कुलो को भी शामिल किया जायेगा।
इंडिअन आयल और एचपीसीएल कंपनी  इस बात के लिए राजी ही गई है की कनेक्शन के लिए वे सिक्युरिटी मनी नहीं लेंगी।
विदित हो की 72 हजार स्कुलो में मिड- डे मील बनता है। एक से कक्षा आठ तक के रोजाना डेढ़ करोड़ बच्चे मिड-डे मील खाते है।
सिलेंडर पर केंद्र नहीं देगी अनुदान :-
उधर केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है की मिड -डे मील बनाने के लिए कॉमर्शियल सिलेंडर पर मिलने वाला अनुदान अब नहीं दिया जायेगा।