जहां एक तरफ ये आंदोलन मोदी के ‘गुजरात माडल’ की हकीकत बयां करता है वहीं दूसरी तरफ इसके नेता द्वारा दिए जा रहे तर्क वही हैं जो सालों से आरक्षण विरोधियों द्वारा दिए जाते रहे हैं। आजादी के बाद से ही देश के पूंजीवादी विकास ने एक तरफ अरबपतियों की संख्या को बढ़ाया है तो वहीं दूसरी तरफ करोड़ो की संख्या में तबाह-बर्बाद लोगों की फौज खड़ी की है। निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण के तहत पिछले दो दशकों का विकास भी रोजगार विहीन रहा है। रोजगार का आलम यह है कि हर पढ़ा-लिखा तीसरा नौजवान बेरोजगार है। नए पैदा हो रहे रोजगारों में अधिकांशतः ही ऐसे है जिनमें भविष्य की कोई गारण्टी नही। ऐसे में अधिकांश नौजवानों को अपना बेहतर भविष्य सरकारी नौकरियों में दिखायी देता है। लम्बी होती बेरोजगारों की भीड़ और उसके मुकाबले सरकारी नौकरियों के चुनिन्दा अवसरों ने युवाओं में जबरदस्त मार-काट (प्रतियोगिता) को जन्म दिया है। इसी गलाकाटू प्रतियोगिता ने उस सोच को पैदा किया है जहां इन अवसरों के सामने खड़ी हर चीज सबसे बड़ी दुश्मन दिखायी देती है। यही वो कारण है जिसने गुजरात में समृद्ध माने जाने वाले पटिदारों को भी आरक्षण के लिए आंदोलन करने को मजबूर किया है। 7 मंत्री, लगभग 40 विधायक, डायमण्ड उद्योग में अच्छी खासी हिस्सेदारी के बावजूद पटेलों का भी एक हिस्सा इन्हीं नीतियों के चलते मालदार बना है तो बाकि का हिस्सा कंगाल। और ये पूरे देश के साथ-साथ गुजरात की भी हकीकत है। पूरे देश की ही तरह इस बर्बाद आबादी से आने वाले युवाओं को भी अपनी तरक्की की राह में सिर्फ एक ही रोड़ा दिखायी देता है और वो है- आरक्षण। युवाओं की आखों पर पड़ा यह पर्दा देश के शासक वर्ग और खुद पटेलों के समृद्ध हिस्से, जिन्होने इन्हीं नीतियों के कारण अरबों कमाए की लूट को छुपा लेता है। यह पर्दा सबको रोजगार ना दे पाने की पूंजीवादी व्यवस्था की हकीकत को छुपा लेता है। यह पर्दा बेरोजगारों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर उन्हें संगठित न होने देने की चाल को छुपा लेता है। और यही सब देश का शासक वर्ग चाहता है। आरक्षण, सदियों के जुल्मों-उत्पीड़न के चलते सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक रूप से पीछे रह गयी आबादी में से एक हिस्से को आगे बढ़ने का मौका देता है। इसी की वजह से निम्न जातियों में से भी कुछ लोग आगे बड़ पाए है। इसके बावजूद भी अगर देश में करोड़ो-करोड़ बेरोजगार हैं तो इसका कारण आरक्षण नही बल्कि नौकरियों का कम होना है। इसका कारण पूंजीवादी व्यवस्था की मुनाफे की हवस में है, जिसे पूरा करने के लिए बेरोजगारों की एक रिजर्व फौज बनाकर रखी जाती है। इसलिए इसका समाधान भी आरक्षण विरोध में नही बल्कि सबके जिए सम्मानजनक रोजगार का नारा बुलंद करने में है।
अगर सूरज की तरह चमकना है, तो सूरज की तरह जलना सीखो। :- ए पी जे अब्दुल कलाम आजाद
रविवार, 30 अगस्त 2015
जलता गुजरात और आरक्षण की राजनीति
जहां एक तरफ ये आंदोलन मोदी के ‘गुजरात माडल’ की हकीकत बयां करता है वहीं दूसरी तरफ इसके नेता द्वारा दिए जा रहे तर्क वही हैं जो सालों से आरक्षण विरोधियों द्वारा दिए जाते रहे हैं। आजादी के बाद से ही देश के पूंजीवादी विकास ने एक तरफ अरबपतियों की संख्या को बढ़ाया है तो वहीं दूसरी तरफ करोड़ो की संख्या में तबाह-बर्बाद लोगों की फौज खड़ी की है। निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण के तहत पिछले दो दशकों का विकास भी रोजगार विहीन रहा है। रोजगार का आलम यह है कि हर पढ़ा-लिखा तीसरा नौजवान बेरोजगार है। नए पैदा हो रहे रोजगारों में अधिकांशतः ही ऐसे है जिनमें भविष्य की कोई गारण्टी नही। ऐसे में अधिकांश नौजवानों को अपना बेहतर भविष्य सरकारी नौकरियों में दिखायी देता है। लम्बी होती बेरोजगारों की भीड़ और उसके मुकाबले सरकारी नौकरियों के चुनिन्दा अवसरों ने युवाओं में जबरदस्त मार-काट (प्रतियोगिता) को जन्म दिया है। इसी गलाकाटू प्रतियोगिता ने उस सोच को पैदा किया है जहां इन अवसरों के सामने खड़ी हर चीज सबसे बड़ी दुश्मन दिखायी देती है। यही वो कारण है जिसने गुजरात में समृद्ध माने जाने वाले पटिदारों को भी आरक्षण के लिए आंदोलन करने को मजबूर किया है। 7 मंत्री, लगभग 40 विधायक, डायमण्ड उद्योग में अच्छी खासी हिस्सेदारी के बावजूद पटेलों का भी एक हिस्सा इन्हीं नीतियों के चलते मालदार बना है तो बाकि का हिस्सा कंगाल। और ये पूरे देश के साथ-साथ गुजरात की भी हकीकत है। पूरे देश की ही तरह इस बर्बाद आबादी से आने वाले युवाओं को भी अपनी तरक्की की राह में सिर्फ एक ही रोड़ा दिखायी देता है और वो है- आरक्षण। युवाओं की आखों पर पड़ा यह पर्दा देश के शासक वर्ग और खुद पटेलों के समृद्ध हिस्से, जिन्होने इन्हीं नीतियों के कारण अरबों कमाए की लूट को छुपा लेता है। यह पर्दा सबको रोजगार ना दे पाने की पूंजीवादी व्यवस्था की हकीकत को छुपा लेता है। यह पर्दा बेरोजगारों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर उन्हें संगठित न होने देने की चाल को छुपा लेता है। और यही सब देश का शासक वर्ग चाहता है। आरक्षण, सदियों के जुल्मों-उत्पीड़न के चलते सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक रूप से पीछे रह गयी आबादी में से एक हिस्से को आगे बढ़ने का मौका देता है। इसी की वजह से निम्न जातियों में से भी कुछ लोग आगे बड़ पाए है। इसके बावजूद भी अगर देश में करोड़ो-करोड़ बेरोजगार हैं तो इसका कारण आरक्षण नही बल्कि नौकरियों का कम होना है। इसका कारण पूंजीवादी व्यवस्था की मुनाफे की हवस में है, जिसे पूरा करने के लिए बेरोजगारों की एक रिजर्व फौज बनाकर रखी जाती है। इसलिए इसका समाधान भी आरक्षण विरोध में नही बल्कि सबके जिए सम्मानजनक रोजगार का नारा बुलंद करने में है।